Q. पियाजे के सिद्धांत के अनुसार प्राकसंक्रियात्मक अवस्था की अवधि है
  • (A) 4 से 8 साल
  • (B) जन्म से 2 साल
  • (C) 2 से 7 साल
  • (D) 5 से 8 साल
✅ Correct Answer: (C) 2 से 7 साल

Explanation:

पियाजे का प्राकसंक्रियात्मक अवस्था (Preoperational Stage), उनकी संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का दूसरा चरण है, जो बच्चों के मानसिक विकास की प्रक्रिया को समझाता है। यह अवस्था 2 से 7 साल के बच्चों के बीच होती है।

इस अवस्था में बच्चों के मानसिक विकास में कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ देखी जाती हैं:

1. प्रतीकात्मक सोच (Symbolic Thinking):

  • बच्चों में इस उम्र में प्रतीकात्मक सोच विकसित होती है, यानी वे किसी वस्तु, व्यक्ति, या घटना के बारे में मानसिक रूप से सोच सकते हैं, भले ही वह वस्तु उनके सामने न हो। उदाहरण के लिए, बच्चे कल्पना की दुनिया में खेल सकते हैं, जैसे कि खिलौनों को "बोलने" या "चलाने" के रूप में मानना।

2. संकल्पना (Egocentrism):

  • इस अवस्था में बच्चे स्वकेंद्रित होते हैं और वे केवल अपनी दृष्टिकोण से ही चीजों को समझते हैं। उन्हें यह समझने में मुश्किल होती है कि दूसरे लोग क्या महसूस करते हैं या उनका दृष्टिकोण क्या हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर एक बच्चा किसी को देखता है, तो उसे लगता है कि वह व्यक्ति वही देख रहा होगा जो वह देख रहा है।

3. द्रव्यमान और संख्या की अस्थायीता (Conservation):

  • इस अवस्था में बच्चे यह नहीं समझ पाते कि किसी वस्तु की मात्रा, आकार, या संख्या उसके रूप बदलने से नहीं बदलती। उदाहरण के लिए, अगर पानी को एक संकरी, लंबी बोतल से एक चौड़ी कटोरी में डाला जाए, तो बच्चों को लगता है कि उसमें पानी की मात्रा बढ़ गई है, जबकि वास्तव में वह समान रहती है।

4. केंद्रित सोच (Centration):

  • बच्चे किसी एक पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं और बाकी पहलुओं की अनदेखी करते हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें यह समझने में कठिनाई होती है कि यदि कोई बच्चा दूसरे बच्चों से बड़ा दिखता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा उम्र में बड़ा होगा।

5. सम्बंधों की कल्पना (Animism):

  • बच्चे इस उम्र में वस्तुओं को भी जीवन्त और संवेदनशील मानने लगते हैं। उदाहरण के लिए, वे यह मान सकते हैं कि खिलौने या अन्य निर्जीव वस्तुएं भी सोच सकती हैं या महसूस कर सकती हैं।

सारांश:

पियाजे के अनुसार, प्राकसंक्रियात्मक अवस्था में बच्चों का सोचने का तरीका बहुत हद तक असंवेदनशील और आदर्शवादी होता है। हालांकि, इस अवस्था में बच्चों का मानसिक विकास तेजी से हो रहा होता है, और वे अधिक जटिल मानसिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए तैयार होते हैं।

इसलिए, इस अवस्था को समझने से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों का सोचने और समझने का तरीका वयस्कों से अलग होता है, लेकिन इसमें बच्चों के मानसिक विकास के महत्वपूर्ण कदम होते हैं।

Explanation by: Praveen Singh

पियाजे का प्राकसंक्रियात्मक अवस्था (Preoperational Stage), उनकी संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का दूसरा चरण है, जो बच्चों के मानसिक विकास की प्रक्रिया को समझाता है। यह अवस्था 2 से 7 साल के बच्चों के बीच होती है।

इस अवस्था में बच्चों के मानसिक विकास में कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ देखी जाती हैं:

1. प्रतीकात्मक सोच (Symbolic Thinking):

  • बच्चों में इस उम्र में प्रतीकात्मक सोच विकसित होती है, यानी वे किसी वस्तु, व्यक्ति, या घटना के बारे में मानसिक रूप से सोच सकते हैं, भले ही वह वस्तु उनके सामने न हो। उदाहरण के लिए, बच्चे कल्पना की दुनिया में खेल सकते हैं, जैसे कि खिलौनों को "बोलने" या "चलाने" के रूप में मानना।

2. संकल्पना (Egocentrism):

  • इस अवस्था में बच्चे स्वकेंद्रित होते हैं और वे केवल अपनी दृष्टिकोण से ही चीजों को समझते हैं। उन्हें यह समझने में मुश्किल होती है कि दूसरे लोग क्या महसूस करते हैं या उनका दृष्टिकोण क्या हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर एक बच्चा किसी को देखता है, तो उसे लगता है कि वह व्यक्ति वही देख रहा होगा जो वह देख रहा है।

3. द्रव्यमान और संख्या की अस्थायीता (Conservation):

  • इस अवस्था में बच्चे यह नहीं समझ पाते कि किसी वस्तु की मात्रा, आकार, या संख्या उसके रूप बदलने से नहीं बदलती। उदाहरण के लिए, अगर पानी को एक संकरी, लंबी बोतल से एक चौड़ी कटोरी में डाला जाए, तो बच्चों को लगता है कि उसमें पानी की मात्रा बढ़ गई है, जबकि वास्तव में वह समान रहती है।

4. केंद्रित सोच (Centration):

  • बच्चे किसी एक पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं और बाकी पहलुओं की अनदेखी करते हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें यह समझने में कठिनाई होती है कि यदि कोई बच्चा दूसरे बच्चों से बड़ा दिखता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा उम्र में बड़ा होगा।

5. सम्बंधों की कल्पना (Animism):

  • बच्चे इस उम्र में वस्तुओं को भी जीवन्त और संवेदनशील मानने लगते हैं। उदाहरण के लिए, वे यह मान सकते हैं कि खिलौने या अन्य निर्जीव वस्तुएं भी सोच सकती हैं या महसूस कर सकती हैं।

सारांश:

पियाजे के अनुसार, प्राकसंक्रियात्मक अवस्था में बच्चों का सोचने का तरीका बहुत हद तक असंवेदनशील और आदर्शवादी होता है। हालांकि, इस अवस्था में बच्चों का मानसिक विकास तेजी से हो रहा होता है, और वे अधिक जटिल मानसिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए तैयार होते हैं।

इसलिए, इस अवस्था को समझने से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों का सोचने और समझने का तरीका वयस्कों से अलग होता है, लेकिन इसमें बच्चों के मानसिक विकास के महत्वपूर्ण कदम होते हैं।

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