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ईस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार शुरू से अंत तक

Filed under: History Modern History on 2021-07-12 17:29:04
सन 1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से इजाजत नामा हासिल कर लिया जिससे कंपनी को पूर्व से व्यापार करने का एकाधिकार मिल गया इस इजाजत ना में का मतलब यह था कि इंग्लैंड की कोई और व्यापारिक कंपनी इस इलाके में ईस्ट इंडिया कंपनी से होड़ नहीं कर सकती थी। स्टार्टर के सहारे कंपनी समुद्र पार जाकर नए इलाकों को खंगाल सकती थी, वहां से सस्ती कीमत पर चीजें खरीद कर उन्हें यूरोप में ऊंची कीमत पर बेच सकती थी। कंपनी को दूसरी अंग्रेज व्यापारिक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा से बचकर ही मुनाफा कमा सकती थी। अगर कोई प्रतिस्पर्धी ना हो तब भी वह सस्ती चीजें खरीद कर उन्हें ज्यादा कीमत पर बेच सकती थी। 

लेकिन यह शाही दस्तावेज दूसरी यूरोपीय ताकतों को पूरब के बाजारों में आने से नहीं रोक सकता था। जब तक इंग्लैंड के जहाज अफ्रीका के पश्चिम तट को छूते हुए केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाकर हिंद महासागर पार करते तब तक पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। वे गोवा में अपना ठिकाना बना चुके थे। पुर्तगाल के खोजी यात्री वास्कोडिगामा ने ही 1498 में पहली बार भारत तक पहुंचने की इस समुद्री मार्ग का पता लगाया था। 17 वीं शताब्दी की शुरुआत तक बच भी हिंद महासागर में व्यापार की संभावना तलाशने लगे थे। कुछ ही समय बाद फ्रांसीसी व्यापारी भी सामने आ गए। 

समस्या यह थी कि सारी कंपनियां एक जैसी चीजें ही खरीदना चाहती थी। यूरोप के बाजारों में भारत के बने बारिक सूती कपड़े और रेशम की जबरदस्त मांग थी। इनके अलावा काली मिर्च, लॉन्ग, इलायची और दालचीनी की भी जबरदस्त मांग रहती थी। यूरोपीय कंपनियों के बीच इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भारतीय बाजारों में इन चीजों की कीमतें बढ़ने लगी और उनसे मिलने वाला मुनाफा गिरने लगा। अब इन व्यापारिक कंपनियों के फलने फूलने का यही एक रास्ता था कि वह अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को खत्म कर दें। लिहाजा बाजारों पर कब्जे की इस होर ने व्यापारिक कंपनियों के बीच लड़ाई यों की शुरुआत कर दी। 17वीं और 18वीं सदी में जब भी मौका मिलता कोई सी एक कंपनी किसी दूसरी कंपनी के जहाज डुबो देती, रास्ते में रुकावटें खड़ी कर देती और माल से लदे जहाजों को आगे बढ़ने से रोक देती। यह व्यापार हथियारों की मदद से चल रहा था और व्यापारिक चौकियों को किलेबंदी के जरिए सुरक्षित रखा जाता था। 

अपनी बस्तियों को किले बंद करने और व्यापार में मुनाफा कमाने की इन कोशिशों के कारण स्थानीय शासकों से भी टकराव होने लगे। इस प्रकार व्यापार और राजनीति को एक दूसरे से अलग रखना कंपनी के लिए मुश्किल होता जा रहा था आइए देखें कि यह कैसे हुआ?

ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में व्यापार शुरू करती है:

पहली English factory 1651 में हुगली नदी के किनारे पर शुरू हुई। कंपनी के व्यापारी यहीं से अपना काम चलाते थे। व्यापारियों को उस जमाने में फैक्टर कहा जाता था। इस फैक्ट्री में वेयर हाउस था जहां निर्यात होने वाली चीजों को जमा किया जाता था। यहीं पर उसके दफ्तर थे जिनमें कंपनी के अफसर बैठते थे। जैसे-जैसे व्यापार खोलो कंपनी ने सौदागरों और व्यापारियों को फैक्ट्री के आस पास आकर बसने के लिए प्रेरित किया। 1696 तक कंपनी ने इस आबादी के चारों तरफ एक किला बनाना शुरू कर दिया था। 2 साल बाद उसने मुगल अफसरों को रिश्वत देकर तीनों गांवों की जमीन दारी भी खरीद ली। इनमें एक गांव कालीकाता था। बाद में कोलकाता बना। अबे इसे कोलकाता कहा जाता है। कंपनी ने मुगल सम्राट औरंगजेब को बात के लिए भी तैयार कर लिया कि वह कंपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार करने का फरमान जारी कर दें।
कंपनी ज्यादा से ज्यादा रियायत है हासिल करने और पहले से मौजूद अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने में लगी हुई थी। उदाहरण के लिए, औरंगजेब के फरमान से केवल कंपनी को ही शुल्क मुक्त व्यापार का अधिकार मिला था। कंपनी के जो अफसर निजी तौर पर व्यापार चलाते उन्हें यह छूट नहीं थी लेकिन उन्होंने भी शुल्क चुकाने से इंकार कर दिया। इससे बंगाल में राजस्व वसूली बहुत कम हो गई। ऐसे में भला बंगाल के नवाब मुर्शीद कुली खान विरोध क्यों नही करते?

व्यापार से युद्ध तक: 

18 वीं सदी की शुरुआत में कंपनी और बंगाल के नवाबों का टकराव काफी बढ़ गया था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद बंगाल के नवाब अपनी ताकत दिखाने लगे थे। उस समय दूसरी क्षेत्रीय ताकतों की स्थिति भी ऐसी ही थी। मुर्शीद कुली खान के बाद अली वर्दी खान और उसके बाद सिराजुद्दोला बंगाल के नवाब बने। यह सभी शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने कंपनी को रियायत देने से मना कर दिया। व्यापार का अधिकार देने के बदले कंपनी से नजराने मांगे, उसे सिक्के डालने का अधिकार नहीं दिया, और उसकी किलेबंदी को बढ़ाने से रोक दिया। कंपनी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए उन्होंने दलील दी कि उसकी वजह से बंगाल सरकार की राजस्व वसूली कम होती जा रही है और नवाबों की ताकत कमजोर पड़ रही है। कंपनी टेक्स्ट गाने को तैयार नहीं थी, उसके अफसरों ने अपमानजनक चिट्टियां लिखें और नवाबों व उनके अधिकारियों को अपमानित करने का प्रयास किया।

कंपनी का कहना था कि स्थानीय अधिकारियों की बेतुकी मांगों से कंपनी का व्यापार तबाह हो रहा है। व्यापार तभी फल फूल सकता है जब सरकार शुल्क हटा ले। कंपनी को इस बात का भी यकीन था कि अपना व्यापार फैलाने के लिए उसे अपनी आबादी बढ़ानी होगी। गांव खरीदने होंगे और किलो का पुनर्निर्माण करना होगा।

यह टकराव दिनों दिन गंभीर होते गए अंतरिम टकराव की परिणिति प्लासी के प्रसिद्ध युद्ध के रूप में हुई।।
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Shyam Dubey     View Profile
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