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प्लासी का युद्ध का परिणाम


अंग्रेज इतिहासकारों ने प्लासी के युद्ध को निर्णायक युद्ध कहा है और इस युद्ध में विजयी होने के कारण उन्होंने क्लाइव की गणना विश्व के महान सेनापतियों में की है और क्वाइव को जन्मजात सेना नायक माना है। किन्तु यह कथन अतिरंजित और एकपक्षीय है।

प्लासी के युद्ध का कोई सैनिक महत्व नहीं है। वास्तव में युद्ध हुआ ही नहीं। युद्ध में किसी प्रकार का रण-कौशल, वीरता या साहस नहीं दिखाया गया था। इसमें थोड़े से सैनिकों की मृत्यु हुई। कुछ गोले-बारूद की बौछार अवश्य हुई। ‘‘प्लासी की घटना एक हुल्लड़ और भगदड़ थी, युद्ध नहीं।’’ वास्तव में प्लासी के युद्ध में विशाल गहरे शड़यंत्र औार कुचक्र का प्रदश्रन था जिसमें एक ओर कुटिल नीति निपुण बाघ था और दूसरी ओर एक भोला शिकार।

इस युद्ध का राजनैतिक महत्व सर्वाधिक है। इस युद्ध से अलीवर्दीखां के राजवंश का अन्त हो गया और मीरजाफर बंगाल का नवाब बना। इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारत की राज्यश्री अंग्रेजों के हाथों में चली गयी। भारत में अंगे्रजी साम्राज्य की नींव पड़ी। इस युद्ध ने अंग्रेजों को व्यापारियों के स्तर से उठाकर भारत का शासक बना दिया। ब्रिटिश कम्पनी ने कलकत्ता में अपनी टकसाल स्थापित की और अपने सिक्के भी ढाले और प्रसारित किये। अंग्रेजों की शक्ति और प्रभुत्व इतना अधिक बढ़ गया कि वे बंगाल में नवाब निर्माता बन गये। यद्यपि युद्ध के बाद मीरजाफर नवाब तो बन गया, पर वह पूर्ण रूप से अंग्रेजों के अधिकार में था। वह अंग्रेजों की कठपुतली मात्र था। अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज बंगाल के वास्तविक स्वामी बन चुके थे। इसीलिए प्लासी का युद्ध भारत के इतिहास में युगान्तरकारी घटना है। इसके बाद भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आया।

बंगाल में अंग्रेजों का प्रभुत्व और आधिपत्य स्थापित हो जाने से अंग्रेजों के लिये उत्तर भारत की विजय का मार्ग प्रशस्त हो गया। बंगाल भारत की अन्य उदीयमान शक्तियों से बहुत दूर था। इसीलिए इन शक्तियों के आक्रमणों और प्रहारों से बंगाल मुक्त था। बंगाल मुगल साम्राज्य के अत्यन्त समीप था। इससे अंग्रेज उस पर सफलता से आक्रमण और प्रहार कर सकते थे। बंगाल का अपना समुद्र तट था इसलिए अंग्रेज समुद्री मागर् से सरलता से अपनी सेनाए बंगाल ला सके और बंगाल से नदियों के मार्ग के द्वारा वे उत्तर भारत में आगरा और दिल्ली तक सरलता से पहुँच सके। बंगाल में उनकी सामुद्रिक शक्ति का बहुत प्रसार हुआ। बंगाल से ही अंग्रेज आगामी सौ वर्षों में आगे बढ़े और सम्पूर्ण भारत पर अपना अधिकार जमा लिया।

प्लासी के युद्ध में विजय के परिणामस्वरूप अंग्रेजों की प्रतिष्ठा और यश-गौरव में भी अत्याधिक वृद्धि हो गयी और उनके प्रतिद्वन्द्वी फ्रांसीसियों की शक्ति और प्रभुत्व को गहरा आघात लगा। अंग्रेजों के अधिकार में बंगाल जैसा धन सम्पन्न और उर्वर प्रांत आ जाने से उनकी आय में खूब वृद्धि हुई और वे फ्रांसीसियों को कर्नाटक के तृतीय युद्ध में सरलता से परास्त कर सके।

इस युद्ध के कारणों ने भारत के राजनीतिक खोखलेपन तथा सैनिक दोषों और व्यक्तिगत दुर्बलताओं को स्पष्ट कर दिया। यह भी स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक शड़यंत्र, कुचक्र, कूटनीति और युद्ध में अंग्रेज भारतीयों की अपेक्षा अधिक प्रवीण थे। अब वे अपनी कूटनीति का प्रयागे भारत के अन्य प्रदशो में कर सकते थे।

प्लासी के युद्ध का आर्थिक परिणाम अंग्रेजों के लिये अत्यधिक महत्व का रहा। मीरजाफर ने नवाब बनने के बाद कम्पनी को 10 लाख रुपये वार्शिक आय की चौबीस परगने की भूमि जागीर के रूप में प्रदान की। क्लाइव और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को पुरस्कार में अपार धन, भंटे और जागीर दी गयी। क्लाइव को 234 लाख पौंड और कलकत्ता की कौंसिल के सदस्यों में से प्रत्येक को सत्तर-अस्सी हजार पांडै की सम्पत्ति प्राप्त हुई। सिराजुद्दौला की कलकत्ता विजय के समय जिनकी क्षति हुई थी उन्हें क्षतिपूर्ति के 18 लाख रुपये बाटें गये। इस प्रकार कुछ ही समय में नवाब मीरजाफर के राजकोश से लगभग पौने दो करोड़ रुपया निकल गया और राजकोश रिक्त हो गया। 1757 ई. - 1760 ई. की अवधि में मीरजाफर ने लगभग तीन करोड़ रुपये घूस में कम्पनी को और उसके अधिकारियों में वितरित किये। 

इस युद्ध के बाद अंगे्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में चुंंगी से मुक्त व्यापार कने की सुविधाएं प्राप्त हो गयी। इससे कम्पनी के कर्मचारियों ने इस सुविधा का दुरुपयागे करके अगले आठ वर्शों में 15 करोड़ से भी अधिक का व्यापारिक लाभ उठाया। शासक के रूप में कम्पनी को टकसाल बनाकर अपने सिक्के ढालने और उनका प्रसार करने का भी अधिकार हो गया। इसीलिये कहा जाता है कि प्लासी के युद्ध के पश्चात् भारत में वह युग प्रारम्भ हुआ जिससे अंग्रेजों का साम्राज्य विस्तार व्यापार से जुड़ गया था। प्लासी के बाद के युग में अंग्रेजों द्वारा बंगाल की वह लूट प्रारम्भ हुई जिससे बंगाल निर्धन बन गया।

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